देहरादून 22 जनवरी। “देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले क्रांतिकारियों में रासबिहारी बोस के महत्वपूर्ण योगदान को सदैव याद किया जायेगा । उन्होंने 1911 से 1945 तक भारत की आज़ादी की लड़ाई के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बीसवीं सदी के आरम्भिक दशकों में तमाम क्रान्तिकारी आन्दोलन के वे सूत्रधार रहे। गदर रिवोल्यूशन, अलीपुर बम काण्ड, हार्डिंग बम काण्ड से लेकर युगान्तर क्रान्तिकारी संगठन के विस्तार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका स्मरणीय है। रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल में बर्धमान जिले के सुबालदह गांव में हुआ उनके पिता का नाम विनोदबिहारी बोस था, नौकरी के सिलसिले में चन्दननगर रहते थे जहाँ से रासबिहारी बोस की प्रारम्भिक शिक्षा पूरी हुयी। उनकी माँ का देहान्त के कारण उनका पालन-पोषण उनकी मामी ने किया। चन्दननगर में डुप्लेक्स कॉलेज में अध्ययन के पश्चात उन्होंने चिकित्सा शास्त्र तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई फ़्रांस और जर्मनी से की। बचपन से ही देश की आजादी का उनका ख्याब था जिसका श्रेय चंदननगर के शिक्षक ‘चारू चाँद’ को जाता था। 1908 में अलीपुर बम मामले में नाम आने के बाद रासबिहारी बोस शिमला पहुँच कर एक छापेखाने में नौकरी करने लगे। उसके बाद देहरादून के फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट (एफ आर आई) में कुछ समय तक रसायन विभाग के संशोधन सहायक के पद पर कार्य किया। सही मायनों में फ्रेंच आधिपत्य वाले चन्दन नगर में रहकर बम बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके थे । रास बिहारी बोस इस शोध संस्थान में नौकरी क्रूड बम निर्माण के लिए आवश्यक कैमिकलों तक पहुंचने के लिऐ कर रहे थे। उनकी मुलाकात क्रान्तिकारी जतिन मुखर्जी के अगुवाई वाले युगान्तर के अमरेन्द्र चटर्जी से परिचय हुआ और वह बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ जुड़ गए। बाद में वह अरबिंद घोष के राजनीतिक शिष्य बन गये तथा जतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश), और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों के निकट आये और इस प्रकार शीघ्र ही वे कई राज्यों के क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आ गए ।भारतीय क्रान्तिकारी इतिहास में अंग्रेज कमाण्डर को गोली मारना तथा ट्रेन में डकैती तथा बम बिस्फोट अनेक घटनाओं का क्रम है लेकिन सबसे दुस्साहस भरा कदम ब्रिटिश वायसराय पर बम फेंकने की योजना भी रासबिहारी बोस ने बनाई थी। इतिहास में इस घटना को ‘दिल्ली षड़यन्त्र’ के नाम से जाना जाता है। बंगाल में क्रान्तिकारियों के बढ़ते दबाव के परिणामस्वरूप मजबूरन अंग्रेजों को भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली में स्थानांतरित करनी पड़ी। रास बिहारी बोस ने अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न करने के लिए तत्कालीन वायसराय हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना भी चन्दननगर में बनाई थी। योजना को क्रियान्वित करने के लिए 21 सितम्बर 1912 को अमरेन्द्र चटर्जी के एक शिष्य बसंत कुमार विश्वास दिल्ली के क्रांतिकारी अमीरचन्द के घर आ गये व दूसरे दिन 22 सितम्बर को रास बिहारी बोस भी दिल्ली आ गये। 23 दिसम्बर को शाही शोभायात्रा निकाली गयी जिसमें एक बड़े हाथी पर वायसराय हार्डिंग्स पत्नी के साथ था । रास बिहारी को ये अन्दाज़ा नही था कि हार्डिंग हाथी पर बैठकर आएगा इसलिये आनन फानन बंगाल के युवा क्रान्तिकारी बसंतकुमार विश्वास को जिम्मेदारियां सौंपी। शोभायात्रा चान्दनी चौक के बीच स्थित पंजाब नेशनल बैंक के सामने पहुंची ही थी कि एकाएक भंयकर धमाका हुआ ,इस बम विस्फोट में वायसराय को हल्की चोटें आई ,लेकिन हाथी का छत्रधारी महावीर सिंह मारा गया।
सरकार ने बम विस्फोट के अपराधियों को पकड़वाने वालों को 75 हजार रूपये पुरस्कार की घोषणा की जोकि काफी बड़ी रकम थी। रासबिहारी बोस रातों-रात रेलगाडी से देहरादून पहुंचे तथा आफिस में अपने कार्य पर जुट गये । उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा में वायसराय पर हुए हमले की निन्दा भी की ताकि षडयन्त्र और बमकाण्ड में शामिल होने का सन्देह न हो । हालाँकि इस बमकाण्ड में शामिल अन्य सभी क्रान्तिकारी पकड़ गये ।1913 में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रासबिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क में आए उन्होंने रासबिहारी मैं नया जोश भरने का काम किया और वे दोगुने उत्साह से क्रान्तिकारी गतिविधियों में लग गये।
रासबिहारी बोस हमारे देश की आजादी के क्रान्तिकारी योध्दा : अनन्त आकाश
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