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आज़ाद हिन्द फौज : रानी झांसी रेजिमेंट का गठन

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अनन्त आकाश/एस.के.एम. न्यूज़ सर्विस

देहरादून, 24 अक्टूबर। इतिहास के  कुछ सितारे कभी नहीं डूबते। वे अपनी निरंतर चमक से पीढ़ियों को राह दिखाते रहते हैं। आज़ाद हिन्द फौज की वीरांगना कैप्टन लक्ष्मी सहगल ऐसा ही एक अमर सितारा हैं, जिन्होंने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की नींव हिला दी, बल्कि उस दौर में महिला सशक्तिकरण का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया जो आज भी प्रासंगिक है। उनका जीवन देश और समाज के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक है। 24 अक्टूबर 1914 को मद्रास (अब चेन्नई) में जन्मी लक्ष्मी स्वामीनाथन का पालन-पोषण एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ राष्ट्रवाद और समाजसेवा के संस्कार गहरे थे। उनके पिता डॉ. एस. स्वामीनाथन एक प्रतिष्ठित वकील थे और माता अम्मू स्वामीनाथन स्वतंत्रता सेनानी थीं। पढ़ाई में कुशाग्र लक्ष्मी ने 1938 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की और स्त्री रोग विशेषज्ञ बनीं। गरीबों की सेवा का उनका जुनून उन्हें 1940 में सिंगापुर ले गया, जहाँ उन्होंने भारतीय प्रवासी मजदूरों के लिए एक क्लिनिक खोला। 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर पहुंचे, तो उनके विचारों से प्रभावित होकर लक्ष्मी ने उनसे मिलने की इच्छा जताई। नेताजी ने उनके नेतृत्व में एक महिला रेजिमेंट बनाने की घोषणा की, जिसका नाम ‘रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट’ रखा गया। कैप्टन का पद संभालने वाली लक्ष्मी ने पाँच सौ से अधिक महिलाओं की एक फौज तैयार की, जो एशिया में अपनी तरह की पहली महिला शाखा थी। उन्हें बाद में कर्नल का पद भी मिला, लेकिन इतिहास ने उन्हें हमेशा ‘कैप्टन लक्ष्मी’ के नाम से ही याद रखा। वे 1943 में अस्थायी आज़ाद हिन्द सरकार की कैबिनेट में पहली महिला सदस्य बनीं और महिला मामलों की मंत्री रहीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी बटालियन के साथ कई मोर्चों पर अंग्रेजों का डटकर सामना किया। युद्ध के बाद ब्रिटिश सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया, लेकिन आजादी के बढ़ते दबाव के बीच उन्हें रिहा करना पड़ा। स्वतंत्रता के बाद कैप्टन लक्ष्मी सहगल का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ; उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के माध्यम से देश और समाज की सेवा को नई दिशा दी। 1947 में कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह के बाद वे कानपुर में बस गईं और वहीं से सामाजिक व राजनीतिक सक्रियता जारी रखी। वर्ष 1971 में उन्होंने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की सदस्यता ग्रहण की और मजदूरों, किसानों तथा वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और जनसेवा के बल पर वे पार्टी की ओर से राज्यसभा सदस्य भी बनीं, जहाँ उन्होंने महिलाओं और श्रमिकों के मुद्दों को संसद के मंच से उठाया। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) की संस्थापक सदस्यों में से एक थीं और संगठन की उपाध्यक्ष के रूप में देश भर में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक आजादी के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं। वर्ष 2002 में उन्होंने चार वामपंथी दलों-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक-के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा। हालाँकि वे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से चुनाव हार गईं, लेकिन राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने वाली भारत की पहली महिला होने का गौरव उन्हें प्राप्त हुआ। यह उनके साहसिक राजनीतिक व्यक्तित्व का प्रमाण था। कैप्टन लक्ष्मी सहगल का योगदान केवल स्वतंत्रता संग्राम या राजनीति तक सीमित नहीं था। वे आजीवन एक सेवक बनी रहीं। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने शरणार्थी शिविरों का नेतृत्व किया और 1984 के भोपाल गैस त्रासदी में पीड़ितों की सहायता के लिए राहत शिविरों का संचालन किया। कानपुर में अपने क्लिनिक के माध्यम से वे अंतिम सांस तक गरीबों, विशेषकर महिलाओं का निःशुल्क इलाज करती रहीं। उनकी सेवाओं के लिए उन्हें 1998 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया। 23 जुलाई 2012 को 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपनी आँखें और शरीर मेडिकल कॉलेज को दान कर दिए, ताकि दूसरों को दृष्टि मिल सके और चिकित्सा शिक्षा को मदद मिल सके। यह उनके निःस्वार्थ सेवा-भाव का चरम उदाहरण था। कैप्टन लक्ष्मी सहगल का जीवन बताता है कि सच्चा नेतृत्व पदों में नहीं, बल्कि साहस, संवेदना और त्याग में होता है। जिस समय महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी कठिन था, उस दौर में उन्होंने न केवल हथियार उठाए, बल्कि सैकड़ों महिलाओं को आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया। उनका जीवन आज भी हर उस कन्या के लिए प्रकाश स्तंभ है जो समाज की बंदिशों को तोड़कर अपने सपनों को उड़ान देना चाहती है। उनका जन्मदिन हमें याद दिलाता है कि सच्ची अमरता स्मारकों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में बसने में है-और कैप्टन लक्ष्मी सहगल आज भी करोड़ों दिलों में धड़कती हैं। लेखक सीपीएम के सचिव हैं।

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