देहरादून। अनन्त आकाश का कहना है कि भारत इन दिनों पश्चिम एशिया में फैले युद्ध और तनाव की कीमत चुका रहा है। हालाँकि भारत का इस युद्ध से सीधा कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी यहाँ के आम नागरिकों को महंगाई और ऊर्जा संकट के रूप में इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। आलोचना है कि मोदी सरकार अमेरिका और इज़राइल के बहुत करीब चल रही है। जब अमेरिका ईरान पर प्रतिबंध लगाता है, तो भारत उसका पालन करता है, भले ही इससे भारत को तेल जैसी जरूरी चीजों की कमी का सामना करना पड़े। ईरान और रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत के लिए फायदेमंद था। लेकिन अमेरिकी दबाव में भारत ने वहाँ से तेल खरीदना बंद कर दिया। जब अब महंगाई बढ़ी और अमेरिका ने खुद ईरान से तेल खरीदने में ढील दी, तब भारत फिर से वहाँ तेल खरीदने गया, लेकिन तब तक ईरान ने भारत के साथ पुराने जैसे अच्छे संबंध नहीं रखे। जब भारत ने अमेरिका के कहने पर ईरान और रूस से तेल खरीदना बंद किया, तो चीन ने वहाँ से सस्ता तेल खरीदकर अपना भंडार भर लिया। यानी अमेरिका की नीति का फायदा चीन को हुआ, जबकि नुकसान भारत को उठाना पड़ा। सरकार पर यह आरोप है कि उसने अमेरिका को खुश करने के चक्कर में ईरान और रूस जैसे पुराने और भरोसेमंद दोस्तों से रिश्ते कमजोर कर लिए। अब जब जरूरत पड़ी, तो ये देश मदद के लिए उस तरह तैयार नहीं हैं जैसे पहले थे। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका अपने हितों के हिसाब से नियम बदलता रहता है। भारत बिना सोचे-समझे उन नियमों का पालन करता है, जिससे हर बार भारत की अपनी ऊर्जा सुरक्षा (तेल-गैस की सप्लाई) खतरे में पड़ जाती है।
भारत को अब यह सोचना होगा कि उसे अमेरिका के हर इशारे पर चलने की बजाय अपने देश के हितों को पहले रखना सीखना होगा। जैसे चीन अपने फायदे के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों की अनदेखी कर लेता है, वैसे ही भारत को भी अपनी ऊर्जा जरूरतों और आम जनता के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हर बार वैश्विक संकट में भारत को महंगाई और तेल संकट की मार झेलनी पड़ेगी।
मोदी सरकार को अमेरिकी इशारों पर चलने के बजाय देश के हितों को देखना होगा : अनन्त आकाश
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