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साइकिल से दफ्तर पहुंचे महानिदेशक बंशीधर तिवारी

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देहरादून। ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु सूचना विभाग में प्रत्येक शनिवार को “नो व्हीकल डे” के रूप में मनाने के निर्देश के क्रम में महानिदेशक सूचना बंशीधर तिवारी आज साइकिल से दफ्तर पहुंचे। वहीं अपर निदेशक आशीष कुमार त्रिपाठी इलेक्ट्रिक वाहन से ऑफिस पहुंचे वहीं संयुक्त निदेशक केएस चौहान पैदल ऑफिस पहुंचे। वहीं संयुक्त निदेशक नितिन उपाध्याय इलेक्ट्रिक वाहन से ऑफिस पहुंचे। ईंधन की बचत, ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर सूचना विभाग, उत्तराखण्ड ने प्रत्येक शनिवार को ‘‘नो व्हीकल डे’’ घोषित किया है। इसी के मद्देनजर संयुक्त निदेशक केएस चौहान भी आज अपने निवास स्थान से लगभग 13-14 किमी. पैदल कार्यालय आयें। उन्होंने यह दूरी 1 घंटा 30 मिनट में पूरी की। आज शाम को वापसी भी कार्यालय से आवास तक पैदल ही जाएंगे। उन्होंने कहा कि कोशिश रहेगी कि प्रत्येक शनिवार को पैदल ही कार्यालय आऊँ। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, इसलिए सभी को छोटे-छोटे प्रयास करने के साथ ही आदेशों का अनुपालन एवं अनुसरण करना चाहिए। संयुक्त निदेशक नितिन उपाध्याय का कहना हैं कि आज हमारे कार्यालय में ‘नो व्हीकल डे’ मनाया गया। हर शनिवार को नो व्हीकल डे रहेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पर्यावरण एवं ऊर्जा संरक्षण की अपील को धरातल पर उतारने का यह एक छोटा सा, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण प्रयास है। हालांकि आज सभी विभागों के लिए यह अनिवार्य नहीं था और लोग स्वैच्छिक रूप से अपने-अपने हिसाब से इसे मना रहे हैं, लेकिन खुशी की बात यह है कि कमोबेश सभी ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। यह दिन केवल गाड़ी घर पर छोड़कर आने भर का नहीं था, बल्कि अपने ‘कंफर्ट ज़ोन’ से बाहर निकलकर खुद को आजमाने जैसा था। कुछ-कुछ वैसा ही, जैसा हम ‘मैन वर्सेस वाइल्ड’ में देखते हैं जब अचानक आपको उन संसाधनों से दूर कर दिया जाता है जिनके आप अभ्यस्त हो चुके हैं, और फिर आप नए रास्तों की तलाश करते हैं।
हम रोजमर्रा की सुख-सुविधाओं के इस कदर आदी हो चुके हैं कि जब आज बदलाव की बारी आई, तो मन में कई सवाल और कशमकश थी। मैं रूटीन में साइकिल चला लेता हूँ, इसलिए सुबह पहला विचार साइकिल से दफ्तर जाने का ही आया। लेकिन जब व्यावहारिक रूप से सोचा, तो मन में संकोच हुआ क्योंकि शहर ही भीड़ भाड़ और ट्रैफिक सिग्नल वाले चौराहों पर साइकिल चलाने का अभ्यास नहीं है । देहरादून शहर के उतार-चढ़ाव वाले रास्तों , सड़कों के स्लोप और भारी ट्रैफिक कंजेशन ने साइकिल का आईडिया ड्राप करने पर मजबूर कर दिया। इसके अलावा मेरे निवास स्थान के पास सीधे कोई सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं है। लेकिन करना तो था ही कुछ। मैं घर से दून यूनिवर्सिटी के पास जहाँ ई-रिक्शा कभी कभी मिल जाता है वहाँ से ई रिक्शा लिया, पहले तो उससे पूरे रास्ते का किराया तय किया लेकिन उसको बोल दिया रास्ते में जहाँ सवारी मिले आप ले लेना, बड़ा ख़ुश हुआ वो।
इस पूरे सफर के दौरान मेरे मन में एक बहुत ही सकारात्मक विचार आया। सड़कों को बेहतर बनाने, सार्वजनिक परिवहन को सुगम करने और ग्रीन ट्रैफिक की योजनाएं बनाने वाले बहुत से अधिकारी भी अपनी-अपनी सहूलियत से इस मुहिम का हिस्सा बन रहे हैं और सड़कों पर निकल रहे हैं। चाहे किसी भी रूप में सही मजबूरी में, व्यवस्था के तहत, या फिर पूरे दिल से जब प्रशासनिक मशीनरी गाड़ियों से उतरकर सड़क पर आती है, तो हर कोई जमीनी हकीकत को महसूस करता है। यह ‘नो व्हीकल डे’ सिर्फ ईंधन बचाने का एक प्रतीकात्मक अभियान नहीं है, बल्कि यह सरकारी व्यवस्था के लिए एक व्यावहारिक पाठशाला भी है। जब हम खुद इन चुनौतियों को देखते हैं, तो हमारा व्यक्तिगत अनुभव एक सामाजिक और सार्वजनिक अनुभव में बदल जाता है, जिसका लाभ आने वाले समय में नीतियों को और अधिक व्यावहारिक व जन-अनुकूल बनाने में जरूर मिलेगा। ई-रिक्शा के इस सफर में आज शहर को एक नए नजरिए से देखा और ईंधन बचाने तथा प्रदूषण कम करने की इस मुहिम में प्रतिभाग कर मन को बेहद संतोष मिला। बदलाव कठिन है, लेकिन मुमकिन है।

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