देहरादून। इतिहास में कुछ कहानियां इतनी अविश्वसनीय होती हैं कि पहली बार सुनने पर यकीन ही नहीं होता। हेमू विक्रमादित्य की कहानी ऐसी ही है। एक साधारण वैश्य परिवार में जन्मा लड़का। न कोई राजवंश, न कोई शाही खून, न कोई विशाल जागीर। शुरुआत नमक, अनाज और दूसरे सामान के व्यापार से हुई। लेकिन कुछ ही दशकों में वही आदमी दिल्ली की गद्दी पर बैठा और खुद को सम्राट विक्रमादित्य घोषित कर दिया। भारतीय इतिहास में ऐसा उदाहरण बहुत कम मिलता है। कहानी 1501 के आसपास शुरू होती है। ज्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि हेमू का जन्म अलवर के मछेरी गांव या उसके आसपास हुआ था। पिता राय पूरन दास व्यापार करते थे। बाद में परिवार मेवात के रेवाड़ी इलाके में बस गया। हेमू का दिमाग बचपन से ही तेज था। संस्कृत, हिंदी, फारसी और हिसाब-किताब सीखा। यही गुण आगे चलकर सबसे बड़ी ताकत बने। उस दौर में दिल्ली पर सूर वंश का शासन था। शेरशाह सूरी की मौत के बाद उसका विशाल साम्राज्य बिखरने लगा। एक के बाद एक दावेदार गद्दी के लिए लड़ रहे थे। इसी अफरा-तफरी में हेमू की प्रतिभा सामने आई। शुरुआत में हेमू को बाजारों की देखरेख का काम मिला। वो अनाज, नमक और जरूरी सामान की कीमतों पर नजर रखता था। धीरे-धीरे उसकी ईमानदारी और प्रशासनिक क्षमता की चर्चा होने लगी। फिर रसद की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद तोपखाने और सेना के प्रबंधन का काम भी हाथ आया। यहीं से हेमू की जिंदगी बदल गई। सूर वंश के शासक आदिल शाह सूरी ने हेमू की काबिलियत पहचान ली। उसने हेमू को अपना सबसे भरोसेमंद सेनापति और वजीर बना दिया। अब हेमू सिर्फ अधिकारी नहीं रहा। वो युद्ध लड़ने लगा। इतिहासकारों के अनुसार, हेमू ने अपने जीवन में 22 से अधिक युद्ध लड़े और ज्यादातर में जीत हासिल की। विद्रोही अफगान सरदारों को हराया। बंगाल से लेकर आगरा तक विरोधियों का दमन किया। और धीरे-धीरे सूर साम्राज्य की सबसे बड़ी ताकत बन गए। लेकिन तभी इतिहास ने एक और करवट ली। 1555 में हुमायूं ने फारस की मदद से दिल्ली दोबारा जीत ली। ऐसा लगा कि मुगल साम्राज्य फिर मजबूत हो जाएगा। लेकिन तकदीर को कुछ और मंजूर था। जनवरी 1556 में हुमायूं की दिल्ली के पुराने किले की सीढ़ियों से गिरकर मृत्यु हो गई। बेटा अकबर उस समय सिर्फ 13 साल का था और पंजाब में था। वास्तविक सत्ता बैरम खान के हाथ में थी। हेमू ने यही मौका देखा। बिजली की रफ्तार से अभियान शुरू किया। पहले आगरा पर कब्जा किया। वहां के मुगल अधिकारी बिना बड़ी लड़ाई के भाग निकले। फिर हेमू सीधे दिल्ली की तरफ बढ़ा। 7 अक्टूबर 1556 को तुगलकाबाद के पास मुगल सेनापति तर्दी बेग को हरा दिया। अब दिल्ली उसके हाथ थी। कुछ ही दिनों बाद पुराना किला गवाह बना एक ऐसे दृश्य का, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। हेमू ने राजतिलक कराया और ‘सम्राट विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। करीब साढ़े तीन सौ साल बाद पहली बार दिल्ली की गद्दी पर कोई ऐसा शासक बैठा था, जिसने स्वयं को प्राचीन भारतीय सम्राटों की परंपरा से जोड़ा। लेकिन हेमू की सबसे कठिन परीक्षा अभी बाकी थी। अकबर और बैरम खान दिल्ली छोड़ने वाले नहीं थे। दोनों सेनाएं 5 नवंबर 1556 को फिर आमने-सामने थीं। जगह वही पानीपत। यानी वही मैदान, जहां 30 साल पहले बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। युद्ध की शुरुआत हेमू के पक्ष में गई। उनके युद्ध हाथी और घुड़सवार तेजी से आगे बढ़े। कई मुगल दस्ते पीछे हटने लगे। ऐसा लगने लगा कि मुगलों की हार तय है। लेकिन इतिहास कई बार एक तीर से बदल जाता है। युद्ध के बीच अचानक एक तीर आकर हेमू की आंख में लगा। तीर आंख को चीरता हुआ सिर तक पहुंच गया। वे गंभीर रूप से घायल होकर अपने हाथी पर ही बेहोश हो गए। बस… यहीं से पूरी बाजी पलट गई। उस दौर में सेना का मनोबल काफी हद तक अपने सेनापति पर टिका होता था। जैसे ही खबर फैली कि हेमू गिर गए हैं, उनकी सेना में अफरा-तफरी मच गई। कई दस्ते पीछे हटने लगे। मुगल सेना ने मौका देखकर जोरदार पलटवार किया। बेहोश हेमू को बंदी बनाकर अकबर के शिविर में लाया गया। आगे क्या हुआ, इस पर इतिहास में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। समकालीन इतिहासकार अबुल फजल के अनुसार, बैरम खान ने अकबर से कहा कि अगर वो स्वयं हेमू का वध करेगा, तो उसे ‘गाजी’ की उपाधि मिलेगी। गाजी यानी इस्लाम के लिए लड़ने वाला योद्धा। वहीं कुछ अन्य स्रोत कहते हैं कि अकबर ने केवल औपचारिक रूप से तलवार छुआई। और असली वार बैरम खान ने किया। कुछ बाद के स्रोतों में दावा किया गया कि अकबर ने स्वयं वार किया। खैर जो भी हुआ हो, लेकिन उसका अंजाम हेमू की मौत और दिल्ली पर मुगलों के फिर से कब्जे के रूप में सामाने आया। आज हेमू विक्रमादित्य का नाम उतना नहीं लिया जाता, जितना बाबर, अकबर या शेरशाह का।
