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विरासत में शिंजिनी कुलकर्णी ने प्रस्तुत किया कथक नृत्य

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देहरादून। विरासत आर्ट एंड हेरीटेज फेस्टिवल 2023 के 13वें दिन के कार्यक्रम की शुरूआत चित्रकला प्रतियोगिता और ट्रेजर हंट कार्यक्रम से हुआ। जिसका संचालन कल्पना शर्मा द्वारा किया गया जहाँ चित्रकला प्रतियोगिता का विषय मेरा शहर मेरी विरासत था, इस दोरान बच्चों के बीच खुशी का माहौल देखा गया। कार्यक्रम मे केन्द्रीय विद्यालय ओएनजीसी, दून प्रेसीडेंसी स्कूल प्रेमनगर ,हिल फाउंडेशन स्कूल ,सन वैली स्कूल ,सेंट ज्यूड्स स्कूल ,दून इंटरनेशनल स्कूल, एसजीआरआर पब्लिक स्कूल बालावाला ,दून सरला अकादमी , टच वुड स्कूल ,व्हिज़किड इंटरनेशनल सीनियर सेकंडरी स्कूल ,आसरा ट्रस्ट, फिलफोट पब्लिक स्कूल, लतिका फाउंडेशन, कोषाध्यक्ष शिकार, हिल फाउंडेशन स्कूल, दून इंटरनेशनल स्कूल,  एसजीआरआर पब्लिक स्कूल बालावाला, व्हिज़किड इंटरनेशनल सीनियर सेकंडरी स्कूल से कुल मिलाकर 400 बच्चों ने जोरों शोरो से भाग लिया और कार्यक्रम की समाप्ति के साथ सभी प्रतिभागियों को इनाम एवं प्रमाण पत्र दिया गया. आज के सांस्कृतिक कार्यक्रम का शुभांरंभ राजीव कुमार सिंह, एजी (ए एंड ई), देहरादून एवं रीच विरासत के महासचिव श्री आर.के.सिंह एवं अन्य सदस्यों ने दीप प्रज्वलन के साथ किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम की पहली प्रस्तुति में शिंजिनी कुलकर्णी द्वारा कथक नृत्य प्रस्तुत किया गया। शिंजनी कुलकर्णी जी का प्रदर्शन शिव वंदना से शुरू हुआ फिर पारम्परिक शुद्ध नृत्य 3 ताल और 4 ताल और दादरा के साथ जो उनके घराने की पारंपरिक रचना है जो उनके परदादा पंडित बिंगारी महाराज द्वारा लिखी गई है। उनके साथ शुभ महाराज तबला पर, गायन में ज़ोहेब हसीन, सितार वादन विशाल मिश्रा, बांसुरी वादन समीर खाना का रहा और पढ़ंत में सिया वर्मा ने सहयोग किया। प्रतिभा, सौंदर्य, समर्पण, अनुग्रह, लालित्य सूची चलती रहती है और वास्तव में, आप ऐसे सभी विशेषण पा सकते हैं, लेकिन वह भी उस जादू का वर्णन करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा जो शिंजिनी कुलकर्णी अपने नृत्य प्रदर्शन के साथ मंच पर बुनती है। कालका बिंदादीन वंश की नौवीं पीढ़ी में जन्मी शिंजिनी कुलकर्णी कथक किंवदंती पंडित बिरजू महाराज की पोती हैं। तीन साल की उम्र से, शिंजिनी ने अपने दादा के संरक्षण में कथक का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था, उनके अनुसार, “हमारे घर में सीखना एक संस्कार है“। शिंजिनी की पहली गुरु उनकी चाची ममता महाराज थीं, जिन्होंने परिवार के सभी बच्चों को बुनियादी प्रशिक्षण दिया। बाद में बिरजू महाराज उनके गुरु थे और उनके बाद उनके सबसे बड़े भाई पं. जयकिशन जी महाराज उनके गुरु रहें।  वह इस विशाल विरासत का भार खूबसूरती से उठाती हैं, लेकिन वह कहती हैं कि उनकी विरासत एक व्यक्ति के लिए बहुत बड़ी है, पूरा कथक समुदाय उनकी विरासत को संभाल रहा है। अकादमिक रूप से एक उत्कृष्ट छात्रा, शिंजिनी ने हाल ही में देश के प्रमुख कला कॉलेज, सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास ऑनर्स में स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। अपनी पढ़ाई में उत्कृष्टता हासिल करने के साथ-साथ उन्होंने अपना प्रशिक्षण भी पूरी लगन और ईमानदारी के साथ जारी रखा है। उन्होंने खजुराहो नृत्य महोत्सव, संकट मोचन समारोह, ताज महोत्सव, चक्रधर समारोह, कालिदास महोत्सव, कथक महोत्सव आदि जैसे प्रतिष्ठित समारोहों में प्रदर्शन किया है। उन्होंने भारत के विभिन्न शहरों और न्यूयॉर्क जैसे विदेशों में कई एकल प्रदर्शन और समूह शो दिए हैं। सैन फ्रांसिस्को, ह्यूस्टन, मिनियापोलिस, बैंकॉक, तेहरान आदि कुछ नाम हैं, और उन्हें अपने करियर की छोटी सी अवधि में दर्शकों से स्नेहपूर्ण सराहना और आशीर्वाद मिला है। उनका बॉलीवुड से जुड़ाव रहा है और अपने नाना की तरह यह भी छोटा रहा है। उन्होंने मुजफ्फर अली की जानिसार, बंगाली फिल्म हर हर ब्योमकेश और रवि किशन के साथ एक भोजपुरी फिल्म में अभिनय किया है। हाल ही में उन्हें बेहद प्रतिष्ठित मंच टेडएक्स पर दो बार बोलने का सौभाग्य मिला, जहां उन्होंने अपने शक्तिशाली विचारों और भाषण से कई लोगों को प्रेरित किया। शिंजिनी नवगठित शुद्ध शास्त्रीय आधारित पर्कशन बैंड – लायाकरी की भी सदस्य हैं। उन्हें अपने दादा की कोरियोग्राफी जैसे नृत्य केली, एडिटिंग, होली उत्सव, कृष्णायन और लोहा का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला है। उनके नाम कई पुरस्कार भी है जिमें मुख्य रूप से 2018 में, उन्हें नई दिल्ली में तराना फाउंडेशन का युवा प्रतिभा पुरस्कार मिला, 2017 में, शिंजिनी को अंतर्राष्ट्रीय कटक नृत्य महोत्सव में नृत्य शिरोमणि की उपाधि से सम्मानित किया गया था, 2017 में, उन्हें संगीत कला निकेतन, जयपुर द्वारा परंपरा सम्मान प्राप्त हुआ। उन्हें प्रतिष्ठित श्रीमती भी प्राप्त हुई। 2015 में क्रिशा हंगल मेमोरियल अवार्ड ने उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य के क्षेत्र में एक उभरती प्रतिभा के रूप में स्वीकार किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम की दुसरी प्रस्तुति में ब्रजेश्वर मुखर्जी द्वारा हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत किया गया. जहां उन्होंने राग भूपाली से अपना प्रदर्शन शुरू किया फिर राग कामोद सुनाया और फिर दो ठुमरी जो याद पिया की ऐ, का करूं सजनी पिया ना आये के साथ अपना प्रदर्शन समाप्त करेंगे। ब्रजेश्वर मुखर्जी के साथ पंडित धर्मनाथ झा तबले पर, पंडित धर्मनाथ मिश्रा जी हारमोनियम पर और नितिन शर्मा और सलोनी रावत तानपुरे पर सगत दी। ब्रजेश्वर मुखर्जी कोलकाता, भारत के एक प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक हैं। उन्हें संगीत की शिक्षा उनके माता-पिता ने दी थी और बाद में उन्होंने बिष्णुपुर घराने के असित रॉय के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेना जारी रखा। वह वर्तमान में प्रख्यात गायक पं. अजय चक्रवर्ती के शिष्य हैं। उन्होंने रेडियो कार्यक्रमों, स्टेज शो और प्रकाशित एल्बमों में बड़े पैमाने पर काम किया है। ब्रजेश्वर मुखर्जी कई पुरस्कारों और सम्मानों के प्राप्तकर्ता हैं, जिनमें संगीत नाटक अकादमी से ’उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार’, कलकत्ता विश्वविद्यालय से ’धनंजय स्मृति पुरस्कार’, श्रुतिनंदन संस्थान से ’श्रुतिनंदन’ पुरस्कार और पुणे से ’गण वर्धन’ शामिल हैं। ब्रजेश्वर जी ऑल इंडिया रेडियो, कोलकाता के बी-हाई ग्रेड नियमित कलाकार हैं। वह संगीत के बारे में अपना ज्ञान साझा करके कई लोगों के जीवन को प्रभावित करने में सक्षम रहे हैं। वह आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी और श्रुतिनंदन में जूनियर गुरु के रूप में कार्य करते हैं। ये दोनों संस्थान अत्यधिक प्रतिष्ठित हैं और भारत में संगीत के मंदिर माने जाते हैं। वह कई लोगों के दिलों तक पहुंचने के लिए दुनिया भर में यात्रा करके सुंदर सीमाहीन संगीत को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम की तीसरी प्रस्तुति में नियाज़ी बंधु द्वारा कव्वाली प्रस्तुत किया गया, उन्होंने अमीर खुसरो द्वारा लिखित क्वाल प्रस्तुत करके प्रदर्शन शुरू किया, उसके बाद कृपा करो महाराज, सांसों की माला, छाप तिलक, इश्क में तेरे कोहे गम, और फिर आज रंग ह रीमा के साथ प्रदर्शन की सम्पति की । उनके के संगत मे माजिद नियाज़ी, मुकरम नियाज़ी और हामिद नियाज़ी थे जो कोर्स और मुख्य कोर्स में थे, बोसिन जी कीबोर्ड पर, वासिफ जी ढोलक पर और विजय जी तबले पर थे। रामपुर घराने के प्रसिद्ध कव्वाल और सूफी गायक, शाहिद नियाज़ी और सामी नियाज़ी (नियाज़ी बंधु), जो अपने संगीत के लिए विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हैं, नियाज़ी ब्रदर्स ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन पूरी ईमानदारी से किया है। नियाजी बंधु बहुमुखी गायन के लिऐ जाने जाते हैं जैसे कव्वाली, नात, ग़ज़ल, भजन, गीत, लोक आदि। वे कव्वाली की रामपुर घराने की 250 साल पुरानी पारिवारिक परंपरा को जारी रख रहे हैं। उस्ताद नियाज़ी ने कव्वाली को “रूह-ए-ग़िज़ा“ (आत्मा के लिए भोजन) के रूप में वर्णित किया है। कव्वाली का निर्माण 13वीं शताब्दी में दिल्ली के चिश्ती संप्रदाय के सूफी संत अमीर खुसरो देहलवी द्वारा भारतीय, फारसी, तुर्की और अरबी संगीत परंपराओं को मिलाकर किया गया था। तबला वादक शुभ जी का जन्म एक संगीतकार घराने में हुआ था। वह तबला वादक श्री किशन महाराज के पोते हैं।  उनके पिता श्री विजय शंकर एक प्रसिद्ध कथक नर्तक हैं, शुभ को संगीत उनके दोनों परिवारों से मिला है। बहुत छोटी उम्र से ही शुभ को अपने नाना पंडित किशन महाराज के मार्गदर्शन में प्रशिक्षित किया गया था। वह श्री कंठे महाराज.की पारंपरिक पारिवारिक श्रृंखला में शामिल हो गए। सन 2000 में, 12 साल की उम्र में, शुभ ने एक उभरते हुए तबला वादक के रूप में अपना पहला तबला एकल प्रदर्शन दिया और बाद में उन्होंने प्रदर्शन के लिए पूरे भारत का दौरा भी किया। इसी के साथ उन्हें पद्म विभूषण पंडित के साथ जाने का अवसर भी मिला।  शिव कुमार शर्मा और उस्ताद अमजद अली खान.  उन्होंने सप्तक (अहमदाबाद), संकट मोचन महोत्सव (वाराणसी), गंगा महोत्सव (वाराणसी), बाबा हरिबल्लभ संगीत महासभा (जालंधर), स्पिक मैके (कोलकाता), और भातखंडे संगीत महाविद्यालय (लखनऊ) जैसे कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रदर्शन किया है। 27 अक्टूबर से 10 नवंबर 2023 तक चलने वाला यह फेस्टिवल लोगों के लिए एक ऐसा मंच है जहां वे शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य के जाने-माने उस्तादों द्वारा कला, संस्कृति और संगीत का बेहद करीब से अनुभव कर सकते हैं। इस फेस्टिवल में परफॉर्म करने के लिये नामचीन कलाकारों को आमंत्रित किया गया है। इस फेस्टिवल में एक क्राफ्ट्स विलेज, क्विज़ीन स्टॉल्स, एक आर्ट फेयर, फोक म्यूजिक, बॉलीवुड-स्टाइल परफॉर्मेंसेस, हेरिटेज वॉक्स, आदि होंगे। यह फेस्टिवल देश भर के लोगों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और उसके महत्व के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त करने का मौका देता है। फेस्टिवल का हर पहलू, जैसे कि आर्ट एक्जिबिशन, म्यूजिकल्स, फूड और  हेरिटेज वॉक भारतीय धरोहर से जुड़े पारंपरिक मूल्यों को दर्शाता है। रीच की स्थापना 1995 में देहरादून में हुई थी, तबसे रीच देहरादून में विरासत महोत्सव का आयोजन करते आ रहा है। उदेश बस यही है कि भारत की कला, संस्कृति और विरासत के मूल्यों को बचा के रखा जाए और इन सांस्कृतिक मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाया जाए। विरासत महोत्सव कई ग्रामीण कलाओं को पुनर्जीवित करने में सहायक रहा है जो दर्शकों के कमी के कारण विलुप्त होने के कगार पर था। विरासत हमारे गांव की परंपरा, संगीत, नृत्य, शिल्प, पेंटिंग, मूर्तिकला, रंगमंच, कहानी सुनाना, पारंपरिक व्यंजन, आदि को सहेजने एवं आधुनिक जमाने के चलन में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इन्हीं वजह से हमारी शास्त्रीय और समकालीन कलाओं को पुणः पहचाना जाने लगा है।

 

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