14 सितंबर को संपूर्ण भारतवर्ष में हिंदी दिवस बड़े गर्व और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह दिन हमारी राष्ट्रभाषा और सांस्कृतिक पहचान हिंदी के सम्मान और उसके संवर्धन का प्रतीक है। इस पावन अवसर पर आज हम एक ऐसी शख्शियत को नमन कर रहे हैं, जिन्होंने शिक्षा, साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़कर हिंदी भाषा को समृद्ध किया है। ‘डॉ. के. रानी’ के उपनाम से साहित्य जगत में विख्यात डॉ. कुसुम रानी नैथानी का जीवन प्रेरणा का एक जीवंत स्रोत है।
रसायन विज्ञान, अर्थशास्त्र, हिंदी, आपदा न्यूनीकरण, एम.एड. और एल.एल.बी. जैसे विविध विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त डॉ. नैथानी ने अर्थशास्त्र में पीएच.डी. की उपाधि हासिल की है। वर्ष 2020 में प्रधानाचार्या पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे निरंतर समाज की सेवा में समर्पित हैं और वर्तमान में जिला पुलिस शिकायत प्राधिकरण, उत्तराखंड की माननीया सदस्या के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं।
तीन दशकों से अधिक समय से बच्चों और वयस्कों के लिए हिंदी एवं गढ़वाली में प्रेरणादायक साहित्य का सृजन कर रहीं डॉ. नैथानी की देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में 800 से अधिक कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं। आकाशवाणी देहरादून से उनकी कहानियों का नियमित प्रसारण होता रहा है। वे विगत 18 वर्षों से पाक्षिक बाल समाचार पत्र ‘बाल पक्ष’ का अवैतनिक संपादन कर बाल साहित्य और हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में ‘चटपटी कहानियां’, ‘नटखट अटखेलियां’, ‘जंगल की कहानियां’, ‘पिंकी बनी जासूस’, ‘उल्टा पड़ा दांव’, ‘पेड़ बोलने लगे’, ‘गड्ढों का रहस्य’, ‘हम हैं होशियार’, ‘चल पड़ा पत्थर’, ‘क्योंकि मैं लड़की हूं’, ‘उत्तराखंड : मेलों के विविध रंग’ और गढ़वाली भाषा में ‘अक्ल कु टप्पु’, ‘बोणा का किस्सा’, ‘दाना सयाणों का किस्सा’, ‘पुरखों का किस्सा’ शामिल हैं। उन्होंने बाल उपन्यास ‘वीणा की कहानी’ का भी लेखन किया है, जबकि उनकी पुस्तकें ‘चंकी ने उगाया सूरज’, ‘उत्तराखंड की नदियां’ और ‘भविष्य की धरोहर’ प्रकाशाधीन हैं।
शिक्षा, समाज सेवा और हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उन्हें वर्ष 2001 में मेरी सहेली में कहानी के लिए प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ।वर्ष 2005 में मुंबई में उत्तरांचल की कहानियां ‘संगम’ कहानी के लिए तृतीय पुरस्कार, वर्ष 2006 में राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान समारोह में साहित्य प्रभा सर्वोच्च ज्ञानमाला सम्मान, वर्ष 2007 में अखिल भारतीय हिंदी सेवी संस्थान इलाहाबाद द्वारा उत्तराखंड गौरव सम्मान, वर्ष 2010 में हिंदी विधि समिति देहरादून द्वारा डॉ. देवकी कुट्टी स्मृति सेवा सम्मान, वर्ष 2015 में शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक उत्कृष्टता पुरस्कार और वर्ष 2016 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय शैक्षिक पुरस्कार (राष्ट्रपति पुरस्कार) से अलंकृत किया गया।
इसी श्रृंखला में वर्ष 2016 में ही उन्हें इंटेलेक्चुअल फाऊंडेशन देहरादून द्वारा नेशन बिल्डिंग अवार्ड तथा बाल साहित्य संस्थान उत्तराखंड द्वारा कलावती भट्ट बाल साहित्य सम्मान मिला। आगे चलकर वर्ष 2018 में बाल साहित्य संस्थान उत्तराखंड द्वारा राजेंद्र सिंह बिष्ट स्मृति बाल साहित्य सम्मान, वर्ष 2020 में कोरोना काल के दौरान उत्कृष्ट कार्य के लिए जिला प्रशासन देहरादून द्वारा कोरोना योद्धा सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया। वर्ष 2022 में चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट नई दिल्ली द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में उनकी दो बाल कहानियों ‘बंटू ने लिया पंगा’ (तृतीय) व ‘अपनी नाव’ (प्रथम) के लिए पुरस्कार मिला। वर्ष 2024 में मां धनपती देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान (कथा समवेत सुल्तानपुर) और वर्ष 2025 में कादंबरी संस्था जबलपुर द्वारा स्व. पं. बाबूलाल तिवारी सम्मान प्रदान किया गया।
हिंदी भाषा के संवर्धन, संरक्षण और बाल साहित्य के विकास में डॉ. कुसुम रानी नैथानी का योगदान अत्यंत सराहनीय है जो इस हिंदी दिवस पर नई पीढ़ी के लिए अपनी भाषा से जुड़ने और समाज सेवा करने का आदर्श प्रस्तुत करता है।
बाल साहित्य के लिए समर्पित हैं डॉ० नैथानी
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