देहरादून, 12 अक्टूबर। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआऱ) एवं प्री-एसआईआऱ प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के विरोध में सोमवार को देहरादून में विभिन्न सामाजिक, महिला, छात्र एवं जन संगठनों ने नागरिक मार्च निकाला। उत्तराखंड इंसानियत मंच और उत्तराखंड महिला मंच के नेतृत्व में आयोजित इस मार्च में एसएसआई, सीटू, छात्र नौजवान सभा, स्त्री मुक्ति लीग संगठन, जनवादी महिला समिति, जन संवाद, एसएफआई, उत्तराखंड आंदोलनकारी संयुक्त परिषद, महिला एकता केंद्र, इप्टा एवं अन्य जन संगठनों के प्रतिनिधियों और नागरिकों ने भाग लिया। विभिन्न राजनीतिक दलों में सीपीएम, सीपीआई, आप और यूकेडी के प्रतिनिधि भी मार्च में शामिल हुए। मार्च गांधी पार्क से शुरू होकर सचिवालय स्थित मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तराखंड के कार्यालय की ओर बढ़ा। लेकिन सचिवालय के निकट तैनात भारी पुलिस बल ने मार्च को रोक दिया। आयोजकों के अनुसार, इस दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच धक्का-मुक्की एवं हाथापाई हुई। पुलिस कर्मियों ने आंदोलनकारियों को धकेलते हुए बसों तक पहुँचाया और उन्हें हिरासत में ले लिया। इस कार्रवाई के चलते आंदोलनकारी मुख्य निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन नहीं सौंप सके। हिरासत में लिए गए प्रमुख लोगों में कमला पंत, निर्मला बिष्ट और डॉ. रवि चोपड़ा आदि शामिल थे। इस अवसर पर राजेन्द्र पुरोहित, त्रिलोचन भट्ट, सुरेंद्र सिंह सजवाण, समर भण्डारी, शिव प्रसाद डोली, लेख राज, नितिन मेलथा, अनंत आकाश, अभिषेक भण्डारी, स्मृति नेगी,अय्याज खान, कनिका, शैलेन्द्र नेगी, सुरेश कुमार,परमिला रावत, दीप्ति रावत, गरिमा दसौनी, सुजाता पोल, एस एस रजवार, भगवन्त पयाल, निर्मला बिष्ट, कनिका, पद्मा गुप्ता, शैलेन्द्र नेगी, अय्याज खान, सुरेश कुमार, विजय भट्ट, इंद्रेश नौटियाल, अनूप नौटियाल,जगदीश कुकरेती, शंकर गोपाल,अशोक शर्मा, मनमोहन सिंह,आदि बड़ी संख्या में लोग शामिल थे। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि मतदान का अधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है और मतदाता सूची में नाम दर्ज होना इसके इस्तेमाल की पहली शर्त है। पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को सटीक एवं पारदर्शी बनाना होना चाहिए, न कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाना। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तराखंड में प्री-एसआईआऱ एवं एसआईआऱ के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से नागरिकों के मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। प्रस्तावित ज्ञापन में उल्लेख किया गया था कि प्री-एसआईआऱ और एसआईआऱ के दौरान उत्तराखंड में लगभग 17.05 लाख नाम हटाए गए, जबकि करीब 4.01 लाख नाम जोड़े गए। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की मतदाता सूची की तुलना में नामों की संख्या में आई इस बड़ी कमी पर संगठनों ने गंभीर चिंता जताई। उन्होंने सवाल उठाया कि नाम हटाने से पहले मतदाताओं से संपर्क, पात्रता का सत्यापन और उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर देने के लिए क्या कदम उठाए गए।वक्ताओं ने कहा कि अनुपस्थिति, स्थान परिवर्तन की आशंका या सत्यापन में कठिनाई मात्र के आधार पर उचित जांच एवं निर्धारित प्रक्रिया के बिना किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाना चाहिए। उन्होंने गलत तरीके से हटाए गए नामों की बहाली तथा पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की मांग की। जनसंगठनों के साथ विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भी मार्च में भाग लिया। आंदोलनकारियों ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि नागरिकों के मताधिकार से जुड़े सवालों पर निर्वाचन अधिकारियों को जवाब देना चाहिए और शिकायतों के निस्तारण के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। मार्च के दौरान आंदोलनकारियों को ज्ञापन सौंपने का अवसर नहीं मिला और उन्हें हिरासत में ले लिया गया। संगठनों ने मताधिकार की रक्षा, हटाए गए नामों की बहाली और वर्ष 2026 की एसआईआऱ प्रक्रिया रद्द करने की मांग दोहराई। आयोजक एवं सहभागी संगठन: उत्तराखंड इंसानियत मंच, उत्तराखंड महिला मंच, एसएफआई, सीटू, किसान सभा, नौजवान सभा, स्त्री मुक्ति लीग संगठन, जनवादी महिला संगठन, जन संवाद, महिला एकता केंद्र, इप्टा एवं अन्य जन संगठन।
प्रमुख मांगें:-
वर्ष 2026 की एसआईआऱ प्रक्रिया रद्द की जाए।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रयुक्त मतदाता सूची को आधार बनाकर नागरिकों के मताधिकार की रक्षा की जाए।
गलत तरीके से हटाए गए नामों की बहाली की जाए।
प्री-SIR के दौरान हटाए गए नामों की स्वतंत्र जांच हो।
नाम हटाने से पूर्व सूचना एवं सुनवाई सुनिश्चित की जाए।
सभी जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में बूथ-स्तरीय शिकायत निवारण शिविर लगाए जाएँ।
मतदाता सूची का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।
शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण हो और नागरिकों को अनावश्यक कार्यालयी प्रक्रियाओं से राहत मिले।
पारदर्शी सत्यापन और उचित प्रक्रिया के बिना किसी नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित न किया जाए।
