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मार्च से शुरू होगा मां पूर्णागिरि मेला

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देहरादून। सुप्रसिद्ध मां पूर्णागिरि मेला अगले वर्ष नौ मार्च से शुरू होगा। मेले की तैयारियों व व्यवस्थाओं को दुरुस्त कराने को लेकर प्रभारी डीएम व एडीएम हेमंत कुमार वर्मा ने तहसील सभागार में सबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ बैठक की। उन्होंने अधिकारियों को मेले से संबंधित सभी व्यवस्थाओं को 15 दिन के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए। टनकपुर तहसील सभागार में हुई बैठक में एडीएम ने बिजली, पानी, सड़क के साथ ही यात्रियों की सुविधाओं के लिए सभी व्यवस्थाएं चाक चौबंद रखने के निर्देश दिए। नगर पालिका टनकपुर एवं नगर पंचायत बनबसा को अपने-अपने क्षेत्रों में लाइट, पार्किंग तथा साफ-सफाई की पुख्ता व्यवस्था रखने को कहा। स्वास्थ्य विभाग को मेला क्षेत्र में एंबुलेंस की तैनाती रखने, काली मंदिर क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं दुरुस्त करने, ठुलीगाड़ व भैरव मंदिर में मेडिकल कैंप लगाने के निर्देश दिए। बैठक में निर्णय लिया गया कि टैक्सी वाहनों का संचालन ठुलीगाड़ से भैरव मंदिर तक होगा। एसडीएम हिमांशु कफल्टिया ने पुलिस अधिकारियों को मेला शुरू होने से तीन दिन पूर्व पुलिस फोर्स की पर्याप्त व्यवस्था करने को कहा। उन्होंने लोनिवि को 28 फरवरी तक सड़कों का काम पूरा करने और रोडवेज के अधिकारियों को मेला अवधि में 10 बसें संचालित करने के निर्देश दिए। बैठक में तय किया गया कि हर सप्ताह श्रद्धालुओं का कोरोना टेस्ट किया जाएगा। मेला क्षेत्र में दुकानदार अपने सामान की दरों को चस्पा करेंगे यदि कोई सामान ओवर रेट बिक्री करते पाया जाता है तो संबंधित के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। बैठक में तहसीलदार पिंकी आर्या, जिला पंचायत के अधिशासी अधिकारी भगवत पाटनी, मंदिर समिति अध्यक्ष किशन तिवारी, कोतवाल चंद्रमोहन सिंह, रेंजर महेश सिंह बिष्ट, भुवन पांडेय, बसंत राज़ चंद, डा. हेमंत वर्मा सहित तमाम विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।

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उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध स्थान में “मां पूर्णागिरि” का दरबार
माँ भगवती की 108 सिद्धपीठों में से एक है यह शक्तिपीठ
देहरादून। उत्तराखण्ड के कण-कण में देवी-देवताओं का वास होने के चलते इसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है। उत्तराखण्ड के चम्पावत जिले में पड़ने वाले उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध स्थान में “मां पूर्णागिरि” का दरबार है। पूर्णागिरि मंदिर उत्तराखण्ड राज्य के चम्पावत नगर में काली नदी के दांये किनारे पर स्थित है । चीन, नेपाल और तिब्बत की सीमाओं से घिरे सामरिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण चम्पावत ज़िले के प्रवेशद्वार टनकपुर से 19 किलोमीटर दूर स्थित यह शक्तिपीठ माँ भगवती की 108 सिद्धपीठों में से एक है। पूर्णागिरी मंदिर की यह मान्यता है कि जब भगवान शिवजी तांडव करते हुए यज्ञ कुंड से सती के शरीर को लेकर आकाश गंगा मार्ग से जा रहे थे। तब भगवान विष्णु ने तांडव नृत्य को देखकर सती के शरीर के अंग के टुकड़े कर दिए जो आकाश मार्ग से पृथ्वी के विभिन्न स्थानों में जा गिरी। कथा के अनुसार जहा जहा देवी के अंग गिरे वही स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गए। माता सती का “नाभि” अंग चम्पावत जिले के “पूर्णा” पर्वत पर गिरने से माँ “पूर्णागिरी मंदिर” की स्थापना हुई। तब से देश की चारों दिशाओं में स्थित मल्लिका गिरि, कालिका गिरि , हमला गिरि व पूर्णागिरि में इस पावन स्थल पूर्णागिरि को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ। पुराणों के अनुसार महाभारत काल में प्राचीन ब्रह्मकुंड के निकट पांडवों द्वारा देवी भगवती की आराधना तथा बह्मदेव मंडी में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा द्वारा आयोजित विशाल यज्ञ में एकत्रित अपार सोने से यहां सोने का पर्वत बन गया। सन् 1632 में कुमाऊं के राजा ज्ञान चंद के दरबार में गुजरात से पहुंचे श्रीचन्द्र तिवारी को इस देवी स्थल की महिमा स्वप्न में देखने पर उन्होंने यहा मूर्ति स्थापित कर इसे संस्थागत रूप दिया। देश के चारों दिशाओं में स्थित कालिकागिरि, हेमलागिरि व मल्लिकागिरि में मां पूर्णागिरि का यह शक्तिपीठ सर्वोपरि महत्व रखता है। आसपास जंगल और बीच में पर्वत पर विराजमान हैं ” भगवती दुर्गा “ । इसे शक्तिपीठों में गिना जाता है। इस शक्तिपीठ में पूजा के लिए वर्ष-भर यात्री आते-जाते रहते हैं। चैत्र मास की नवरात्र में यहां मां के दर्शन का विशेष महत्व बढ जाता है।

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उत्तराखण्ड जनपद चम्पावत के टनकपुर के पर्वतीय अंचल में स्थित अन्नपूर्णा चोटी के शिखर में लगभग 3000 फीट की उंचाई पर यह शक्तिपीठ स्थापित है। पूर्णागिरि भारत- नेपाल सीमा पर आस्था का केंद्र तो है ही पर नैसर्गिक सौंदर्य प्रेमियों के लिए भी यह कम रोमांचकारी नहीं है। पूर्णागिरि के आसपास का क्षेत्र प्रसिद्ध जिम कार्बेट नैशनल पार्क में आता है जिसके कारण यहां विचरण करने वाले वन्य प्राणियों को आसानी से देखा जा सकता है। इसी क्षेत्र से काली नदी पहाड़ों से उतर कर मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है। अन्नपूर्णा पर्वत की चोटी से सूर्योदय व सूर्यास्त, काली नदी, चम्पावत, टनकपुर व नेपाल के गांवों का मनोरम दृश्य देखते ही बनता है।यहां की सप्त धाराओं से बनी सरयू नदी दक्षिण-पश्चिम दिशा से विस्तार लेती हुई टनकपुर भावर के मैदानी इलाके में प्रवेश करती है, जहां इसे शारदा नदी के नाम से जाना जाता है। यह नदी भारत और नेपाल की सीमा रेखा भी निर्मित करती है। शारदा नदी का फैलाव देखकर पर्यटक स्तब्ध रह जाते हैं। नदी में पहुंचने से पहले दूर-दूर तक फैली रेत मानों पर्यटकों का स्वागत करती है। दूरस्थ क्षेत्रों से आए यात्रियों की भीड़ आसपास देखने को मिलती है। यहां सरकारी, प्राइवेट व निजी वाहनों की कतारें लगी रहती हैं। नदी के किनारे बाजार-सा माहौल रहता है, जिसमें कुछ लोग चाय की दुकान पर चाय की चुस्की लेते हैं। कुछ छोले-भटूरे खाने में मस्त रहते हैं व कुछ यात्री ठहरने के लिए होटल व धर्मशाला ढूंढते हैं। यहां छोटी-छोटी दुकानें बड़ी ही आकर्षक लगती हैं। सफेद बताशे और चुनरी लिए सैलानी नदी में स्नान के लिए जाते हैं। मानो शारदा नदी का शीतल व निर्मल जल मां भगवती के चरणों का स्पर्श कर रहा हो। यह स्थल यात्रियों का प्रथम विश्राम स्थल है। पूर्णागिरि मंदिर जाने का यह प्रवेश द्वार भी है। यहीं से वन मार्ग आरंभ हो जाता है। ककराली गेट बस स्टैंड से थोड़ा आगे जाने पर घने वन को पार करते हुए एक संकरे व चढ़ाई वाले मार्ग पर चलना पड़ता है। मार्ग में दूर-दूर तक झाड़िया, लताएं व ऊंचे-ऊंचे वृक्षों के रूप में प्रकृति पसर कर स्वागत करती है। लगभग 14 किलोमीटर की चढ़ाई पूरी करने के बाद ठूलीगाड़ पर बने अस्थायी बस स्टैंड पर पहुंचे। यहां एक छोटा-सा बाजार है। इसके निकट एक बड़ी-सी नदी है जो इस चढ़ाई में पड़ने वाले अन्य नदी-नालों से बड़ी है इसलिए इसे ठूली (बड़ी) गाड़ कहते हैं। आगे बढ़ने पर चढ़ाई के साथ-साथ गाड़ी की गति धीमी होती जाती है। पर्वतों की शीतल पवन से सूर्य का ताप तेजहीन होता जाता है। रानीघाट का मैदान तथा किहुआ की नौली पार करते हुए प्राचीन महादेव की मंडी पहुंचते हैं। यहां से आगे लगभग 5 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई शुरू हो जाती है। यहीं से पूर्णागिरि शिखर (मंदिर) की यात्रा का शुभारंभ हो जाता है। तीन जल धाराओं को पार करते ही बांसी की चढ़ाई शुरू हो जाती है।हरियाली से भरे वन मार्ग पर पैदल यात्रा करना आनंद का अनुभव कराता है। रास्ते में सीढ़ीनुमा खेत व पहाड़ी गांव, जगह-जगह दिखाई देते हैं। जैसे-जैसे चढ़ाई चढ़ते जाते हैं हरी-भरी झाडिय़ां और लताओं के बीच चीड़ और देवदार के पेड़ गगन छूते दिखाई देते हैं। बवाली और कुसुलिया को पार करके हुमांस तक पहुंचा जाता है। यहां पर कई बच्चों का मुंडन संस्कार किया जाता है। इस क्षेत्र में प्राकृतिक नजारा देखते ही बनता है। पर्वतों के बीच से चांदी से झरझर बहते झरने दूर से साफ दिखाई देते हैंं। हुमांस से आगे बांस के जंगलों के बीच चढ़ाई दुर्गम होती जाती है। आकाश में उमड़ते-घुमड़ते बादल कभी पर्वत की चोटी को छूते तो कभी पर्वत शृंखलाओं से बच कर हवा के साथ आगे निकल जाते हैं।

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इन्हीं पर्वत शृंखलाओं की चोटी पर पूर्णागिरि माता का भव्य मंदिर है। मां भक्तों की इच्छा पूर्ण करती हैं शायद इसीलिए इन्हें पूर्णागिरि कहते हैं। पूर्णागिरि एक शक्तिपीठ स्थल है। यह मंदिर बहुत शांत व सौम्य स्थल पर बना हुआ है। इस स्थल पर पहुंचकर तन-मन को अध्यात्म की स्वर लहरियां पूरी तरह प्रभावित करती हैं। मस्तिष्क मां के चरणों में स्वत: ही झुककर सम्मोहन में बंध जाता है। पूर्णागिरि मंदिर में प्रतिवर्ष चैत्र मास में आयोजित होने वाले मेले में भीड़ कुंभ के मेले जैसा विशाल रूप ले लेती है। पूर्णागिरि के आसपास के क्षेत्र भी अपनी नैसर्गिक आभा बिखेरते हुए सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इनमें श्यामला ताल, दुर्ग के अवशेष, चम्पावत, देवीधुरा, लोहाघाट, एबट माऊंट, पंचेश्वर, आदिगोरखनाथ, रीठा साहिब आदि मनोहारी स्थल इस क्षेत्र में देखने को मिलते हैं।
सिद्ध बाबा मंदिर की कथा :- पूर्णागिरी मंदिर के सिद्ध बाबा के बारे में यह कहा जाता है, कि एक साधू ने व्यर्थ रूप से माँ पूर्णागिरी के उच्च शिखर पर पहुचने की कोशिश करी, तो माँ ने क्रोध में साधू को नदी के पार फेक दिया। मगर दयालु माँ ने इस संत को “सिद्ध बाबा” के नाम से विख्यात कर उसे आशीर्वाद दिया। जो व्यक्ति मेरे दर्शन करेगा, वो उसके बाद तुम्हारे दर्शन भी करने आएगा। जिससे कि उसकी मनोकामना पूरी होगा। कुमाऊं के अधिकतर लोग सिद्धबाबा के नाम से मोटी रोटी बना कर सिद्धबाबा को भेट स्वरुप चढाते है।
पूर्णागिरी मंदिर में स्थित “झूठे का मंदिर” की कहानी :- पौराणिक कथा के अनुसार यह भी उल्लेख है कि एक बार संतान विहीन सेठ को देवी ने सपने में कहा कि “मेरे दर्शन के बाद ही तुम्हे पुत्र होगा”। सेठ ने माँ पूर्णागिरी के दर्शन किये और कहा कि यदि उसका पुत्र होगा तो वह देवी के लिए सोने का मंदिर बनाएगा। |मनोकामना पूरी होने पर सेठ ने लालच कर सोने के मंदिर की जगह ताम्बे के मंदिर में सोने की पॉलिश लगाकर देवी को अर्पित करने के लिए मंदिर की ओर जाने लगा तो ” टुन्याश ” नामक स्थान पर पहुचकर। वह ताम्बे के मंदिर को आगे नहीं ले जा सका था। तब सेठ को उस मंदिर को उसी स्थान में रखना पडा। तब से वो मंदिर पौराणिक समय से वर्तमान में “झूठे का मंदिर” नाम से जाना जाता है।
पूर्णागिरी मंदिर की मान्यता यह भी है कि देवी और उनके भक्तो के बीच एक अलिखित बंधन की साक्शी मंदिर परिसर में लगी रंगबिरंगी लाल-पीली चीरे आस्था की महिमा को बयान करती है। मनोकामना पूरी होने पर पूर्णागिरी मंदिर के दर्शन व आभार प्रकट करने और ‘चीर की गांठ’ खोलने आने की मान्यता भी है। नवरात्रियो में पूर्णागिरी मंदिर की मान्यता यह है कि नवरात्री में देवी के दर्शन से व्यक्ति महँ पुण्य का भागिदार बनता है। देवी सप्तसती में इस बात का उल्लेख है कि नवरात्रियो में वार्षिक महापूजा के अवसर पर जो व्यक्ति देवी के महत्व की शक्ति निष्ठापूर्वक सुनेगा। वो व्यक्ति सभी बाधाओ से मुक्त होकर धन धान्य से संपन्न होगा।
पूर्णागिरी मंदिर के बारे में यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर मुंडन कराने पर बच्चा दीर्घायु और बुद्धिमान होता है। इसलिए इसकी विशेष महत्वता है। लाखो तीर्थ यात्री इस स्थान में मुंडन करने के लिए पहुचते है। प्रसिद्ध वन्याविद एवम् आखेट प्रेमी जिम कॉर्बेट ने सन 1927 में विश्राम कर अपनी यात्रा में पूर्णागिरी के प्रकाश पुंजो को स्वयम देखकर इस देवी शक्ति के चमत्कार का देशी और विदेशी अखबारों में उल्लेख कर इस पवित्र स्थल को काफी मशहूर किया। कहा जाता है कि जो भक्त सच्ची आस्था लेकर पूर्णागिरी की दरबार में आता है, मनोकामना साकार कर ही लौटता है।

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