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उत्तराखण्ड की पावन धरा पर जीवंत होता इतिहास

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चमोली। उत्तराखण्ड की पावन धरा पर जीवंत होती एक ऐसी परंपरा, जो सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि इतिहास, आस्था और लोकजीवन का अद्भुत संगम है रम्माण। जनपद चमोली के सलूड-डूंगरा गांव से उद्भूत यह लगभग 500 वर्षों पुराना उत्सव आज भी अपनी मूल स्वरूप में उतनी ही ऊर्जा और भव्यता के साथ मनाया जाता है।
रम्माण की सबसे बड़ी विशेषता इसका रहस्यमयी और आकर्षक मुखौटा नृत्य है, जिसमें कलाकार बिना शब्दों के ही रामायण की गाथा को जीवंत कर देते हैं। ढोल-दमाऊं की गूंज, पारंपरिक ताल-लय और सजीव अभिनय दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। हर पात्र, हर हाव-भाव और हर प्रस्तुति में एक अलग ही रोमांच और आध्यात्मिक अनुभूति देखने को मिलती है।

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