देहरादून। उत्तराखंड चारधाम यात्रा यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ का इतिहास सदियों पुराना है और यह मुख्य रूप से पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। इसे 8वीं शताब्दी में महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा एक संगठित तीर्थयात्र के रूप में स्थापित किया गया था। आदि शंकराचार्यः उन्होंने इन चारों धामों के मंदिरों का जीर्णाेद्धार किया और इन्हें हिंदू धर्म में मोक्ष प्राप्ति का प्रमुख मार्ग माना।
अलंकनंदा नदी की बायी ओर स्थित बद्रीनाथ भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने हजारों साल पहले यहां तपस्या की थी बद्रीनाथ मंदिर के पास व्यास गुफा है। जहां ऋषि वेदव्यास ने महाभारत और अन्य शास्त्र लिखे थें। इसे भगवान विष्णु का निवास माना जाता है, जहाँ भगवान विष्णु ने नर नारायण के रूप में तपस्या की थी। बद्रीनाथ धाम की कहानी सतयुग से जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस क्षेत्र में कठोर तपस्या की थी। उस समय अत्यधिक ठंड से उन्हें बचाने के लिए माता लक्ष्मी ने ‘बद्री’ (बेर) का वृक्ष बनकर उन्हें छाया प्रदान की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम ‘बद्रीनाथ’ पड़ा।
बद्रीनाथ क्षेत्र को नर-नारायण पर्वत के बीच बसा माना जाता है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, धर्म और उनकी पत्नी मूर्ति ने पुत्र प्राप्ति के लिए तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनके घर ‘नर’ और ‘नारायण’ के रूप में अवतार लिया। इन दोनों भाइयों ने इस जगह पर मानव कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए सदियों तक कठोर तपस्या की। बद्रीनाथ मन्दिर में हिंदू धर्म के देवता विष्णु के एक रूप “बद्रीनारायण” की पूजा होती है। यहाँ उनकी ३.३ फीट लंबी शालिग्राम से निर्मित मूर्ति है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे आदि शंकराचार्य ने ८वीं शताब्दी में समीपस्थ नारद कुण्ड से निकालकर स्थापित किया था। इस मूर्ति को कई हिंदुओं द्वारा विष्णु के आठ स्वयं व्यक्त क्षेत्रों में से एक माना जाता है। यद्यपि, यह मन्दिर उत्तर भारत में स्थित है, “रावल” कहे जाने वाले यहाँ के मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य के नम्बूदरी सम्प्रदाय के ब्राह्मण होते हैं। विष्णु पुराण, महाभारत तथा स्कन्द पुराण जैसे कई प्राचीन ग्रन्थों में इस मन्दिर का उल्लेख मिलता है। आठवीं शताब्दी से पहले आलवार सन्तों द्वारा रचित नालयिर दिव्य प्रबन्ध में भी इसकी महिमा का वर्णन है। एक अन्य संकल्पना अनुसार इस मन्दिर को बद्री-विशाल के नाम से पुकारते हैं और विष्णु को ही समर्पित निकटस्थ चार अन्य मन्दिरों – योगध्यान-बद्री, भविष्य-बद्री, वृद्ध-बद्री और आदि बद्री के साथ जोड़कर पूरे समूह को “पंच-बद्री” के रूप में जाना जाता है। पौराणिक लोक कथाओं के अनुसार, बद्रीनाथ तथा इसके आस-पास का पूरा क्षेत्र किसी समय शिव भूमि (केदारखण्ड) के रूप में अवस्थित था। जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह बारह धाराओं में बँट गई, तथा इस स्थान पर से होकर बहने वाली धारा अलकनन्दा के नाम से विख्यात हुई। मान्यतानुसार भगवान विष्णु जब अपने ध्यानयोग हेतु उचित स्थान खोज रहे थे, तब उन्हें अलकनन्दा के समीप यह स्थान बहुत भा गया। नीलकण्ठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतार लिया, और क्रंदन करने लगे। उनका रूदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा, और उन्होंने बालक के समीप उपस्थित होकर उसे मनाने का प्रयास किया, और बालक ने उनसे ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। यही पवित्र स्थान वर्तमान में बद्रीविशाल के नाम से सर्वविदित है।
हिमालय में स्थित बद्रीनाथ क्षेत्र भिन्न-भिन्न कालों में अलग नामों से प्रचलित रहा है। स्कन्दपुराण में बद्री क्षेत्र को “मुक्तिप्रदा” के नाम से उल्लेखित किया गया है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि सत युग में यही इस क्षेत्र का नाम था। त्रेता युग में भगवान नारायण के इस क्षेत्र को “योग सिद्ध”, और फिर द्वापर युग में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन के कारण इसे “मणिभद्र आश्रम” या “विशाला तीर्थ” कहा गया है। कलियुग में इस धाम को “बद्रिकाश्रम” अथवा “बद्रीनाथ” के नाम से जाना जाता है। स्थान का यह नाम यहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले बद्री (बेर) के वृक्षों के कारण पड़ा था। एडविन टी॰ एटकिंसन ने अपनी पुस्तक, “द हिमालयन गजेटियर” में इस बात का उल्लेख किया है कि इस स्थान पर पहले बद्री के घने वन पाए जाते थे, हालाँकि अब उनका कोई निशान तक नहीं बचा है।
केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित हिन्दुओं का प्रसिद्ध मंदिर है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। पत्थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डवों के पौत्र महाराजा जन्मेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। हजारों साल पुराना एक पवित्र तीर्थस्थल केदारनाथ एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है जहां कठिन यात्र के बाद पहुंचा जाता है। मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यहीं पर देवता की पूजा लिंगम के रूप में की जाती है। केदारनाथ की यात्र वास्तव में धन्य है। महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों ने भगवान शिव की खोज की और यहाँ केदारनाथ मंदिर की स्थापना की। मंदिर के पास और भी पवित्र स्थान है जैसे आदि शंकराचार्य, कालीमठ, गौरकुण्ड और सोनप्रयाग की समाधि स्थल यहां पर स्थित है। केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है। केदारनाथ जी के तीर्थ पुरोहित इस क्षेत्र के प्राचीन ब्राह्मण हैं, उनके पूर्वज ऋषि-मुनि भगवान नर-नारायण एवं दक्ष प्रजापति के समय से इस ज्योतिर्लिंग की पूजा करते आ रहे हैं। पांडवों के पोत्र राजा जन्मेजय ने उन्हें इस मंदिर में पूजा करने का अधिकार दिया था एवं यह सम्पूर्ण केदार क्षेत्र उन्हें दान स्वरुप दिया था। और वे तब से यहां पर तीर्थयात्रियों की पूजा कराते आ रहे हैं। शुक्ल यजुर्वेद अथवा बाजसेन संहिता का पाठ करने के कारण ये लोग शुक्ला अथवा बाजपेयी कहलाते हैं, शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के अनुयायी होने के कारण इनके गोत्र शांडिल्य, उपमन्यु, धौम्य आदि हैं। दक्षिण भारत से जंगम समुदाय के पुजारी मंदिर में शिव लिंग की पूजा करते हैं, जबकि तीर्थ यात्रियों की ओर से पूजा तीर्थ पुरोहित ब्राह्मणों द्वारा की जाती है। मन्दिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिण्ड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं।
राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से गंगा माता पृथ्वी पर अवतरित हुईं, और यह पवित्र स्थल गंगोत्री धाम के नाम से विख्यात हुआ। गंगोत्री को मां गंगा का उदगम स्थल भी माना जाता है। यहां से शुरू हुई मां गंगा गंगासागर में जाकर मिलती है। गंगोत्री में स्नान करने आदि अनादि काल के पाप भी धुल जाते है।
गढ़वाल हिमालय का सबसे पश्चिमी मंदिर यमुनोत्री वह स्थान है जहां से पवित्र नदी यमुना का उदगम होता है। जानकीचट्टी में गर्म पानी के झरने है। जहां तीर्थयात्री यमुना मंदिर की ओर अपनी यात्र शुरू करने के पहले डुबकी लगातें है। बहुत पहले टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रताप शाह ने देवी नदी का मंदिर बनवाया था जहां सूर्यकुण्ड स्थित है। यमुनोत्री धाम सूर्य पुत्री यमुना और यमराज के रहस्य से जुड़ा है।
1962 से पहलेः 1950 के दशक तक, इन दुर्गम हिमालयी तीर्थस्थलों तक पहुँचना बहुत कठिन था। केवल घुमंतू साधु या साधन-संपन्न लोग ही पैदल यह यात्र कर पाते थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रें में आधारभूत संरचना का विकास किया। इससे पहाड़ी रास्तों पर सड़कें बनीं और आम लोगों के लिए यात्र सुलभ हो गई। इसके लिये जहां देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कुशल रणनीति कारगर साबित हुुई वहीं उत्तराखण्ड राज्य के मुख्यमंत्री एक विजन के तहत चारधाम यात्र को सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न करा रहे है। जिसका परिणाम भी सामने देखने को मिल रहां है। आज लाखों तीर्थयात्री चारों धामों के दर्शन कर रहें।
बद्रीनाथ भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर
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