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गुरुदक्षिणा समर्पण भाव का प्रतीक

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देहरादून। ‘दक्षिणा का विचार केवल पैसे की दृष्टि से नहीं करना चाहिए। प्रत्यक्ष पूजन का आग्रह करना चाहिए। दक्षिणा चंदे जैसी इकट्ठी नहीं करनी चाहिए। अधिक से अधिक स्वयंसवेकों को प्रत्यक्ष ध्वजपूजन कर, दक्षिणा समर्पित करनी चाहिए। यह मेरा कार्य है, इसके लिए मुझे कष्ट उठाने चाहिए, कुछ देना चाहिए, यह स्वयंसेवकों की वृत्ति रहे। यह भाव निरंतर बढ़े, ऐसा प्रयास होना चाहिए। पैसा जुटाना, धन-संचय करना न हमारा कार्य है और न ही हमारा हेतु। हमारे कार्य का वह एक स्वाभाविक परिणाम रहे। तन-मन-धन पूर्वक में अपना काम करूँगा- यह विचार हमारे कार्य का आधार है। पहले ही दिन कोई भी व्यक्ति सर्वस्व तो समर्पित नहीं कर सकता। उस भावना का क्रम से विकास करना पड़ता है। गुरुदक्षिणा बढ़ाने के लिए अयोग्य आग्रह अथवा जोर-जबरदस्ती कभी नहीं करनी चाहिए। स्वयंसेवक की सद्भावना को आघात नहीं पहुंचाना चाहिए। किसी का मन नहीं दुखाना चाहिए। स्वयंसेवकों के मन की प्रसन्नता भंग नहीं होनी चाहिए।”

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