Pahaad Connection
Breaking News
Breaking Newsउत्तराखंड

28 अगस्त को ही मनाया जाएगा रक्षाबंधन का पर्व : डॉक्टर आचार्य सुशांत राज

Advertisement

डॉक्टर आचार्य सुशांत राज

देहरादून। भाई-बहन के पवित्र प्रेम का त्योहार है जो हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी (रक्षासूत्र) बांधती हैं, उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं और भाई उनकी रक्षा का वचन देते हैं। वर्ष 2026 में रक्षाबंधन का यह पर्व 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। भारतीय धर्म-संस्कृति के अनुसार रक्षाबन्धन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन को स्नेह की डोर में बाँधता है। इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर टीका लगाकर रक्षा का बन्धन बाँधती है, जिसे राखी कहते हैं। यह एक हिन्दू व जैन त्योहार है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण (सावन) में मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी (सावनी) या सलूनो भी कहते हैं। रक्षाबन्धन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्त्व है। राखी कच्चे सूत-जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी महँगी वस्तु तक की हो सकती है। रक्षाबन्धन के दिन बहनें भगवान् से अपने भाइयों की उन्नति के लिए प्रार्थना करती हैं। सामान्यतः बहनें ही भाइयों को राखी बाँधती हैं, परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित सम्बन्धियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता को) भी बाँधी जाती है। कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बाँधी जाती है। रक्षाबंधन के दिन भाई अपने बहन को राखी के बदले कुछ उपहार देते है।

Advertisement

डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस बार राखी पर यानी 28 अगस्त 2026 के दिन चंद्र ग्रहण लगने वाला है। जब तक चंद्र ग्रहण रहेगा, उसी बीच सुबह 9:48 बजे श्रावण पूर्णिमा तिथि खत्म हो जाएगा. श्रावण पूर्णिमा तिथि पर ही रक्षाबंधन मनाते हैं. वर्ष 2026 में रक्षा बंधन का पावन पर्व 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार) को मनाया जाएगा, क्योंकि इस दिन सावन मास की पूर्णिमा तिथि उदया तिथि के रूप में विद्यमान है। श्रावण पूर्णिमा की शुरुआत 27 अगस्त (गुरुवार) की सुबह 9:08 बजे से हो रही है। श्रावण पूर्णिमा का अंत 28 अगस्त (शुक्रवार) की सुबह 9:48 बजे होगा।  उदयातिथि के अनुसार, रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को ही मनाया जाएगा। यह चंद्र ग्रहण भारत में दृश्य नहीं होगा। शास्त्रों का स्पष्ट विधान है कि जहां ग्रहण दिखाई नहीं देता, वहां उसका सूतक काल मान्य नहीं होता। इसलिए भारत में इसका कोई दोष या अशुभ प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका अर्थ है कि 28 अगस्त 2026 को रक्षा बंधन का पर्व किसी भी शुभ मुहूर्त में मनाया जा सकता है। संक्षेप में कहें तो चंद्र ग्रहण का कोई भी छाया-दोष भारत में नहीं लग रहा है। बहनें बिना किसी हिचकिचाहट के अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर इस पावन पर्व को पूरे उत्साह के साथ मना सकती हैं।

पूर्णिमा तिथि और मुहूर्त

Advertisement

पूर्णिमा तिथि आरंभ: 27 अगस्त 2026 को सुबह 09:08 बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त: 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:48 बजे

Advertisement

राखी बांधने का शुभ मुहूर्त: 28 अगस्त को सुबह 05:57 बजे से सुबह 09:48 बजे तक

भद्रा काल: 27 अगस्त को सुबह 09:08 बजे से रात 09:32 बजे तक रहेगा, जिसके कारण 27 तारीख को राखी बांधना वर्जित माना गया है।

Advertisement

राखी बांधने का सबसे शुभ समय:

सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: सुबह 06:23 से लेकर 09:48 के तक।

Advertisement

अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:14 से लेकर दोपहर 01:05 तक।

गोधूलि मुहूर्त : शाम 06:57 से लेकर शाम 07:19 बजे तक।

Advertisement

चौघड़िया मुहूर्त:

लाभ: सुबह 07:57 से 09:31 तक।

Advertisement

अमृत: सुबह 09:31 से 11:05 तक।

शुभ: दोपहर 12:40 से 02:14 तक।

Advertisement

चर: शाम 05:22 से 06:57 तक।

लाभ: रात्रि 09:48 से 11:14 तक।

Advertisement

राहुकाल: दिन में 11:05 से दोपहर 12:40 तक। इसलिए अभिजीत मुहूर्त में बांधते वक्त इसका ध्यान रखें। संक्षेप में कहें तो चंद्र ग्रहण का कोई भी छाया-दोष भारत में नहीं लग रहा है। बहनें बिना किसी हिचकिचाहट के अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर इस पावन पर्व को पूरे उत्साह के साथ मना सकती हैं।

चंद्र ग्रहण सुबह 6:55 बजे से शुरू होकर दोपहर 12:30 बजे समाप्त होगा। यह चंद्र ग्रहण भारत में दृश्य नहीं होगा। शास्त्रों का स्पष्ट विधान है कि जहां ग्रहण दिखाई नहीं देता, वहां उसका सूतक काल मान्य नहीं होता। इसलिए भारत में इसका कोई दोष या अशुभ प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका अर्थ है कि 28 अगस्त 2026 को रक्षा बंधन का पर्व किसी भी शुभ मुहूर्त में मनाया जा सकता है।

Advertisement

मनाने की विधि – थाली में रोली, अक्षत (चावल), दीपक, मिठाई और राखी रखें।भाई के माथे पर तिलक लगाएं और चावल लगाएं। भाई की आरती उतारें। भाई की दाईं कलाई पर राखी बांधें। भाई को मिठाई खिलाएं और आशीर्वाद लें।

भविष्य पुराण में लिखा है कि देव और असुरों में जब युद्ध शुरू हुआ, तब असुर या दैत्य देवों पर भारी पड़ने लगे। ऐसे में देवताओं को हारता देख देवेंद्र इन्द्र घबराकर ऋषि बृहस्पति के पास गए। तब बृहस्पति के सुझाव पर इन्द्र की पत्नी इंद्राणी (शची) ने रेशम का एक धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। जिसके फलस्वरूप इंद्र विजयी हुए। कहते हैं कि तब से ही पत्नियां अपने पति की कलाई पर युद्ध में उनकी जीत के लिए राखी बांधने लगी।

Advertisement

दूसरी कथा हमें स्कंद पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में मिलती है। कथा के अनुसार असुरराज दानवीर राजा बली ने देवताओं से युद्ध करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था और ऐसे में उसका अहंकार चरम पर था। इसी अहंकार को चूर-चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ से वामन अवतार लिया और ब्राह्मण के वेश में राजा बली के द्वार भिक्षा मांगने पहुंच गए। चूंकि राज बली महान दानवीर थे तो उन्होंने वचन दे दिया कि आप जो भी मांगोगे मैं वह दूंगा। भगवान ने बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि की मांग ली। बली ने तत्काल हां कर दी, क्योंकि तीन पग ही भूमि तो देना थी। लेकिन तब भगवान वामन ने अपना विशालरूप प्रकट किया और दो पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नाप लिया। फिर पूछा कि राजन अब बताइये कि तीसरा पग कहां रखूं? तब विष्णुभक्त राजा बली ने कहा, भगवान आप मेरे सिर पर रख लीजिए और फिर भगवान ने राजा बली को रसातल का राजा बनाकर अजर-अमर होने का वरदान दे दिया। लेकिन बली ने इस वरदान के साथ ही अपनी भक्ति के बल पर भगवान से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन भी ले लिया।

भगवान को वामनावतार के बाद पुन: लक्ष्मी के पास जाना था लेकिन भगवान ये वचन देकर फंस गए और वे वहीं रसातल में बली की सेवा में रहने लगे। उधर, इस बात से माता लक्ष्मी चिंतित हो गई। ऐसे में नारदजी ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया। तब लक्ष्मीजी ने राजा बली को राखी बांध अपना भाई बनाया और अपने पति को अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। तभी से यह रक्षा बंधन का त्योहार प्रचलन में हैं।

Advertisement

उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहते हैं। इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपकर्म होता है। उत्सर्जन, स्नान-विधि, ॠषि-तर्पणादि करके नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। ब्राह्मणों का यह सर्वोपरि त्यौहार माना जाता है। वृत्तिवान् ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते हैं।

Advertisement
Advertisement

Related posts

एएमसी ने शुरु किया नया एसआईपी अभियान

pahaadconnection

गांव से मोहभंग: 200 से ज्यादा परिवारों ने छोड़ा पोखरी गांव, मजबूरी ने दिया जमीन छोडऩे का दर्द

pahaadconnection

यूपीसीएल के ऊर्जा भवन में निदेशक मंडल की 124वीं बैठक आयोजित

pahaadconnection

Leave a Comment